शैशवावस्था (Infancy)

                विकास की अवस्थाएं : शैशवावस्था

         (Stages of Development : Infancy)

मानव जीवन में विकास की सभी अवस्थाओ  में शैशव का महत्व सबसे अधिक है।     मनोवैज्ञानिक न्यूमैन ( J.Newman ) के अनुसार - "5 वर्ष तक की अवस्था शरीर तथा मस्तिष्क के लिए बड़ी ग्रहण शील रहती है ।" इस समय जो कुछ किया या सिखाया जाता है उसका प्रभाव तत्काल पड़ता है । फ्रायड का कथन है , "मनुष्य को जो कुछ बनना होता है प्रारंभ के चार- पांच वर्षों में ही बन जाता है।" एडलर ने कहा है , "शैशवावस्था द्वारा जीवन का पूरा क्रम निश्चित होता है ।" क्रो और क्रो ने कहा है- बीसवीं शताब्दी को बालक की शताब्दी कहा जाता है।"

मनोवैज्ञानिकों के इन विचारों के अनुसार , इस अवस्था को जीवन का आधार कहा जा सकता है जिस पर बालक के भावी जीवन का निर्माण होता है।

                   शैशवावस्था का अर्थ

                Meaning of Infancy

साधारण मनुष्य के जन्म के बाद प्रथम 6 वर्ष की आयु उसकी शैशवावस्था कहलाती है । कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार:-

 हरलॉक -  यह जन्म से लेकर 2 सप्ताह तक चलती है । 2 सप्ताह बाद बालपन (babyhood)आरंभ होता है और 2 वर्ष तक रहता है ।2 वर्ष बाद प्रारंभिक बाल्यावस्था आती है और 6 वर्ष तक की आयु तक रहती है।

उपर्युक्त विचार महिला मनोवैज्ञानिक हरलॉक ने व्यक्त की है , जो कि शैशव के संबंध में सूक्ष्म एवं व्यापक अर्थ की ओर संकेत करते हैं सामान्य रूप से सभी मनोवैज्ञानिकों ने जन्म से 5 या 6 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था माना हैं । जैसा कि क्रो और क्रो  ने लिखा है,  "शैशवावस्था औसतन जन्म से 5 या 6 वर्ष तक चलती है, जिसमें इंद्रिया काम करने लगती है और बालक रेंगना, चलना और बोलना सीखता है।"

           शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएं

      Chief Characteristics of Infancy

शैशवावस्था में शारीरिक मानसिक सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास से संबंधित कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है:-

1 शारीरिक विकास में तीव्रता (Rapidity in physical Growth)

बालक के जीवन में प्रथम 3 वर्षों में शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है । प्रथम वर्ष में लंबाई तथा भार दोनों में तीव्र वृद्धि होती है। उसकी कर्मेंद्रियों , आंतरिक अंगों ,मांस पेशियों आदि का भी उत्तरोत्तर विकास होता है।

2. अपरिपक्वता ( Immaturity) - इस समय शिशु शारीरिक तथा बौद्धिक रूप से अपरिपक्व होता है । धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से वह पालन - पोषण द्वारा परिपक्व होता है।

3. पर - निर्भरता (Dependancy) - जन्म के बाद कुछ समय तक वह बड़ी असहाय स्थिति में रहता है उसे भोजन तथा अन्य शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा स्नेह और सहानुभूति प्राप्त करने के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है।

4. मूल - प्रवृत्ति आत्मक व्यवहार (Instinctive Behaviour)

इस समय शिशु का अधिकांश व्यवहार मूल प्रवृत्तियों पर आधारित होता है । भूख लगने पर वह रोता, क्रोधित होता है ,और जो भी वस्तु उसके पास होती है उसी को मुंह में डाल लेता है।

5. मानसिक क्रियाओं में तीव्रता (Rapidity in Mental Process)

शिशु की मानसिक क्रियाओं के अंतर्गत ध्यान, स्मृति, कल्पना , संवेदना ,प्रत्यक्षीकरण आदि का विकास तेजी से होता है।

 6 .  सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता ( Rapidity in Learning Process ) - इस समय सीखने की गति बहुत तेज होती है । गेसेल ( Gesell ) का कथन है- “ बालक प्रथम छः वर्षों में , बाद के बारह वर्षों से दूना सीख लेता है "

 7 . कल्पनाशीलता ( Imaginativeness ) - इस समय शिशु में कल्पना की मात्रा अधिक पाई जाती है और वह कल्पना जगत् में विवरण करने लगता है । थार्नडाइक का विचार है कि- " 3 से 6 वर्ष के बालक प्रायः अर्द्ध - स्वप्नों की हालत में रहते हैं । वे सत्य - असत्य में अन्तर नहीं कर पाते । फलस्वरूप वे कल्पना की अधिकता के कारण झूठ बोला करते हैं । रॉस ने कहा कि " शिशु कल्पना में स्वयं नायक बन जाता है और कल्पना के द्वारा ही वह जीवन की कठोरता को दूर करता है ।"

  ( 8 ) दोहराने की प्रवृत्ति ( Attitude of Repetition ) - इस अवस्था में शिशु में किसी क्रिया या शब्दों को दोहराने की विशेष प्रवृत्ति होती है ।

 ऐसा करने में उसे आनन्द मिलता है । इसी आधार पर किन्डरगार्टन तथा मान्टेसरी स्कूलों में बच्चों से गीत और रचना की आवृत्ति कराई जाती है । 

( 9 ) अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति ( Attitude of Learning by Imitation ) - शिशु सबसे अधिक और जल्दी अनुकरण विधि से सीखते हैं । परिवार में माता - पिता , भाई - बहनों तथा अन्य सदस्यों के व्यवहार का वह अनुकरण और सीखता है ।

 ( 10 ) प्रत्यक्षात्मक अनुभव द्वारा सीखना ( Learning by Perceptual Experience ) - मानसिक रूप से परिपक्व न होने के कारण वह प्रत्यक्ष और स्थूल वस्तुओं के सहारे सीखता है । किन्डरगार्टन तथा मान्टेसरी प्रणाली में उपहारों तथा शिक्षा उपकरणों का प्रयोग किया जाता है । इनका निरीक्षण वह करता है और ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभव प्राप्त करता है ।

 ( 11 ) संवेगों का प्रदर्शन ( Emotional Expression ) - शिशु जन्म से ही संवेगात्मक व्यवहार का प्रदर्शन करता । रोना , चिल्लाना , हाथ - पैर पटकना आदि क्रियाएँ संवेगपूर्ण ही होती है । बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार आरम्भ में शिशु में मुख्य रूप से चार संवेग पाये जाते हैं- भय , क्रोध , प्रेम , पीडा ।

( 12 ) आत्म - प्रेम की भावना ( Feeling of Self love ) - शैशवावस्था में शिशु में आत्म - प्रेम की भावना बहुत प्रबल होती है । इस समय वह यह चाहता है कि केवल उसे ही माता - पिता , भाई - बहनों का पूर्ण स्नेह मिले । ऐसा न होने पर वह अन्य भाई - बहनो से ईर्ष्या करता है । जो वस्तु या खिलौना उसे दिया जाता है । उसे वह दूसरों को न देकर अपने पास ही रखना चाहता है । 

( 13 ) काम प्रवृत्ति ( Sex Instinct ) - फ्रायड तथा अन्य मनोविश्लेषणवादियों का कहना है कि इस अवस्था में शिशु की प्रेम भावना काम प्रवृत्ति पर आधारित होती है और यह प्रवृत्ति बड़ी प्रबल होती है , किन्तु उसका प्रकाशन वयस्कों की भाँति नहीं होता । शिशु का अपने अंगों से प्रेम करना , माता का स्तनपान करना , हाथ - पैर का अंगूठा चूसना आदि काम प्रवृत्ति के सूचक हैं । 

( 14 ) नैतिक भावना का अभाव ( Absence of Moral Feeling ) - इस समय शिशु का नैतिक विकास नहीं हो पाता है । उसे अच्छी बुरी , उचित और अनुचित बातों का ज्ञान नहीं होता है । वह वही कार्य करता है जिसमें उसे आनन्द आता है भले ही वह नैतिक रूप से अवांछनीय हो । जिन कार्यों से उसे दुःख होता है उन्हें वह छोड़ देता है । रास ने कहा है- "आगे चलकर सामाजिक वातावरण इस आनंद और दुख प्रेरक को कुछ-कुछ व्यवस्थित रूप से पारितोषिक और दंड देकर पुनः बल देता है"।

(15) अकेले वह साथ खेलने की प्रवृत्ति - यदि हम शिशु के व्यवहार का भली-भांति निरीक्षण करें तो हम देख सकते हैं कि उसमें पहले अकेले एकांत में खेलने और फिर बाद में दूसरों के साथ खेलने की प्रवृत्ति होती है इस प्रवृत्ति का क्रो और क्रो ने इस प्रकार वर्णन किया है "बहुत ही छोटा शिशु अकेले खेलता है धीरे-धीरे वह दूसरे बालकों के समीप खेलने की अवस्था से गुजरता है अंत में वह अपनी आयु के बालकों के साथ खेलने में महान आनंद का अनुभव करता है।"

(16) सामाजिक भावना का विकास(Development of Social Feeling)- शैशवावस्था के अंतिम वर्षों में सामाजिक भावना का विकास होता है वैलेंटाइन का विचार है-" 4 या 5 वर्ष के बालक में अपने छोटे भाई बहनों यह साथियों की रक्षा करने की प्रवृत्ति होती है वह 2 से 5 वर्ष तक के बच्चों के साथ खेलना पसंद करता है वह अपनी वस्तुओं में दूसरों के समय साझीदार बनाता है वह दूसरे बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है और दुख में उनको सांत्वना देने का प्रयास करता है।"


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