सीखने में एकता की भूमिका एवं इसका संवर्द्धन

 

Q.9. सीखने में एकता की भूमिका एवं इसका संवर्द्धन का वर्णन करें। 

Discuss the Role of Concentration in learning and its enhancement.

Ans. प्रत्येक व्यक्ति नित्यप्रति अपने जीवन में नये अनुभव एकत्र करता रहता है। ये नयी अनुभव, व्यक्ति के व्यवहार में वृद्धि तथा संशोधन करते हैं इसलिए वे अनुभव तथा इनका ही सीखन का अधिगम करना कहलाता है। मनोवैज्ञानिकों ने सीखने को मानसिक प्रक्रिय 1 है। यह क्रिया जीवनभर निरन्तर चलती रहती है। सीखने की प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण विशेषतहै-एकाग्रता ।

 सीखने के लिए यह आवश्यक है कि सीखने वाला सीखने के लिए तैयार हो। यदि ह सीखने के लिए तैयार होगा तो जाहिर है तो उस सीखने वाले में सीखने की एकाग्रता होगी। एकाग्रता के बल पर ही सीखने के सामने आने वाली समस्या को हल करने का प्रयास करता है। एकाग्रता के कारण ही वह सीखाये जानेवाले बिन्दुओं पर वह विशेष ध्यान देता है और हो बिन्दुओं को हृदयंगम करने का प्रयास करता है। यदि वह एकाग्रचित्र नहीं होगा तो निश्चय ह उसे सीखने में दिक्कत होगी । जब सीखनेवाले के सामने कोई समस्या होती है और वह उसे हल करने के लिए प्रयत्न करता है और यदि वह एकाग्रचित होता है तो निश्चय ही उसे सीखने में सफलता मिलती है। जब तक मनुष्य सीखने के लिए एकाग्रचित नहीं होता तब तक वह न स्वयं सोख पाता है और न कोई उनको सीखा पाता है। अतः आवश्यक है कि सर्वप्रथम विद्यार्थियों को सीखने के लिए एकाग्रचित किया जाये। एकाग्रचितता से ध्यान केन्द्रित होती है और विद्यार्थी किसी भी कार्य को शीघ्र सीख लेते हैं, उन्हें सीखने में आनंन्द मिलता है। सीखने के लिए एकाग्रचित नहीं होने पर उन्हें सीखने की क्रिया से असंतोष मिलता है, वे खीझ उठते हैं।

किसी दूसरी वस्तु के बजाय एक ही वस्तु पर चेतना का केंद्रीकरण एकाग्रचित होना है। किसी वस्तु पर ध्यान देने के लिए मानसिक सक्रियता का होना आवश्यक है। जैसे हम कमल के फूल पर ध्यान दें तो मन उसकी विशेषताओं की ओर खींच जाता है और सक्रिय हो जाता है। ध्यान मानसिक सक्रियता का ही रूप है। मन बहुत ही चंचल होता है। यह किसी वस्तु पर ज्यादा देर तक नहीं ठहर पाता है लेकिन चंचलता के कारण ही व्यक्ति सदैव नवीन वस्तुओं की ख निकालने में रुचि लेता है। जिस वस्तु की ओर हमारी रुचि अधिक होती है, उस वस्तु की ओर हमारा झुकाव भी अधिक होता है और ध्यान की स्थिरता उस वस्तु पर और अन्य वस्तुओं को की ओर अपेक्षा ज्यादा हो जायेगी । रुचिकर वस्तुओं पर हम जल्दी एकाग्रचित हो जाते हैं। एक समय हम तमाम वस्तुओं पर एक साथ ध्यान नहीं दे सकते हैं क्योंकि ध्यान चयनात्मक और संकुचित होता है। यह रुचिकर वस्तुओं पर शीघ्रता से आकर्षित होता है। जब हम किसी सुन्दर वस्तु को देखते हैं तो हम उस वस्तु की ओर आकर्षित होते हैं, ज्यादा एकाग्रचित हो पाते हैं। चूँकि हमें सौन्दर्य की एक आकर्षक अनुभूति होती है और इसलिए हम उस और एकाग्रचित्त होती हैं और इसलिए हम उस और एकाग्रचित हो पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि एकाग्रचितता किसी-न-किसी प्रयोजन के साथ लिये होता है। जहाँ पर प्रयोजन पूर्ति की जितनी संभावना होगी यहाँ पर चित को स्थिरता उतनी ही ज्यादा होगी। साथ ही, किसी वस्तु पर ध्यान देने के लिए व्यक्ति को चित्त की एकाग्रता एवं तत्परता होना आवश्यक है। किसी विशेष वस्तु में समायोजन का होना आवश्यक है जबकि उस पर ध्यान दिया जाता है। जैसे देखने के लिए नेत्रों की गतियों का समायोजन दृश्यों से होता है। हम जिन वस्तुओं पर ध्यान देते हैं वे हमार मन में सक्रिय रूप से स्पष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत, हम जिन वस्तुओं के प्रति ध्यान नहीं देते हैं उनका हमारे मन में कोई असर नहीं पड़ता। हमारा चित्त चंचल होता है क्योंकि यह अन्वेषणात्मक है, यह निरन्तर छानबीन के लिए कोई ताजी चीज खोजता रहता है। हमारा ध्यान प्रायः नई वस्तुओं की ओर केन्द्रित होता है और नई चीज मिलने पर व्यक्ति उसके ढाँचे एवं उसके रंग-रूप पर विश्लेषण और संश्लेषण करने लगता है। यहाँ मानव की प्रवृत्ति है जब हमारा चित्र एक पहलू की ओर जाता है तो दूसरी पहलू की ओर से ध्यान स्वतः ही हट जाता है। पहली अवस्था भावात्मक तथा दूसरी अवस्था अभावात्मक अवस्था कहलाती है।

               स्थिर वस्तु के बजाय चलती हुई वस्तु की ओर हमारा ध्यान जल्दी आकर्षित होता है। बैठे या खड़े हुए मनुष्य के बजाय भागते हुए मनुष्य की ओर हमारा ध्यान शीघ्र जाता है। हमें जिस वस्तु को देखने का जितना अधिक समय मिलता है, उस पर हमारा ध्यान उतना ही केन्द्रित होता है इसलिए शिक्षक पाठ की मुख्य-मुख्य बातों को श्यामपट्ट पर लिखते हैं जो वस्तु जितनी अधिक उत्तेजना उत्पन्न करती है उतनी ही अधिक हमारा ध्यान उसकी ओर खिंचता है। धीमी आवाज की तुलना में तेज आज हमा ध्यान अधिक आकर्षित करती है। यदि हम सुन्दर व्यक्तियों के परिवार में किसी कुरूप व्यक्ति की ओर देखते हैं तो उसकी विषमता के कारण हमारा ध्यान उसकी और अवश्य जाता है। हमारा चित्त, नवीन, विचित्र या अपरिचित वस्तु की ओर अवश्य आकर्षित होता है। हम छोटी वस्तुओं की अपेक्षा बड़ी वस्तुओं की ओर जल्दी एकाग्रचित हो जाते हैं। चौराहे पर बड़े-बड़े विज्ञापनों के लगाये जाने के कारण उनकी ओर हमारा ध्यान शीघ्र एकाग्रचित होता है जो वस्तु सुडौल, सुन्दर और अच्छी बनावट की होती है, उसे देखने को हमारी इच्छा स्वयं होती है। छोटे बच्चे विशेषकर रंग-बिरंगी वस्तुओं के प्रति बहुत सरलता से आकर्षित होते हैं जो बात बार-बार दोहराई जाती है, उसकी ओर हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक है। विद्यार्थियों के ध्यान को केंद्रित रखने के लिए शिक्षक मुख्य-मुख्य बातों को बार-बार दोहराते हैं। 

        सीखने में एकाग्रता का सबसे बड़ा आधार हमारी रुचि है। व्यक्तिगत दशाओं को एक शब्द, 'रुचि' में व्यक्त किया जा सकता है। हम उन्हीं वस्तुओं की ओर ध्यान देते हैं जिनमें हमें रुचि होती है जिनमें हमको रुचि नहीं होती है, उनकी ओर हम ध्यान नहीं देते हैं। सीखनेवाले के सीखने के विषय का यह ज्ञान होता है तो उस पर एकाग्रता सरलता से केन्द्रित होता है। कलाकार की कल की वस्तुओं पर ध्यान केन्द्रित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। परीक्षा के दिनों में विद्यार्थियों की एकाग्रता अध्ययन पर केन्द्रित करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। परीक्षा के दिनों में विद्यार्थियों को एकाग्रता अध्ययन पर केन्द्रित रहता है क्योंकि इससे वे परीक्षा में उत्तीर्ण होने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। व्यक्ति की जिस बात में जिज्ञासा होती है, उसमें वह अवश्य देता है जो वस्तु व्यक्ति की आवश्यकता को पूर्ण करती है, उसमें वह ध्यान जान स्वाभाविक है। भूखे व्यक्ति का भोजन की ओर ध्यान जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

 सीखने में एकाग्रता को संवर्धित करने के उपाय-- विद्यालय कार्य की एक मुख्य समस्या सदैव एकाग्रता को समस्या रही है। इसीलिए नये शिक्षकों को सदैव यह निर्देशित किया जाता है कि वे कक्षा में विद्यार्थियों में एकाग्रता को केन्द्रित कराये।

कक्षा या बालकों में एकाग्रता के संवर्द्धन के लिए निम्नलिखित उपायों को प्रयोग में लाया जा सकता है-

 1. शांत वातावरण- कोलाहल, बालकों के ध्यान को विचलित करता है। अतः उनके ध्यान को केन्द्रित रखने के लिए शिक्षक को कक्षा का वातावरण शांत रखना चाहिए।

2. पाठ की तैयारी- पाठ को पढ़ाते समय कभी-कभी ऐसा अवसर आ जाता है जब शिक्षक किसी बात को भली प्रकार से नहीं समझा पाते हैं। ऐसी दशा में वह विद्यार्थियों के एकाग्रता को आकर्षित नहीं कर पाता है। अतः शिक्षक को प्रत्येक पाठ्यांश को सिखाने के पूर्व 'सौखने को योजना' अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए।

3. विषय में परिवर्तन- विद्यार्थियों का मन चंचल होता है और बहुत समय तक एक विषय पर केन्द्रित नहीं रह पाता है। अतः शिक्षकों को चाहिए कि दो घण्टों में एक विषय लगातार न पढ़ाकर भिन्न-भिन्न विषय पढ़ाये जाने चाहिए जिससे उनकी एकाग्रता भंग न हो पाये।

4. विद्यार्थियों के प्रयास को प्रोत्साहन- यदि अध्यापक, बालकों को निष्क्रिय श्रोता बना देता है, तो वह अपने शिक्षण के प्रति उनके एकाग्रता को बनाये रखने में असफल होता है। अतः आवश्यक है कि वर्ग कक्ष संचालन के क्रम में विद्यार्थियों से भी समय-समय पर अलग-अलग विद्यार्थियों से सम्बन्धित सवाल पूछे जाएँ, प्रतिपुष्टि प्रदान की जाये तथा सबसे जरूरी है कि बालकों के प्रयास की इच्छा को जीवित रखा जाये विद्यार्थियों के इच्छा को जीवित रखकर पा 1 उनके प्रयास के लिए प्रोत्साहित करके शिक्षक उनके ध्यान को सदैव प्राप्त कर सकता है।

5. विद्यार्थियों की प्रवृत्तियों का ज्ञान- यह आवश्यक है कि शिक्षकगण अपने शिक्षण कौशलों के अनुरूप विद्यार्थियों के एकाग्रता को बनाये रखें तभी प्रभावी अधिगम सम्भव है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि शिक्षकों को विद्यार्थियों के सभी प्रवृत्तिायें का ज्ञान होना चाहिए। यदि वे इन प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर अपने शिक्षण की आयोजन करता है तो वह विद्यार्थियों के एकाग्रता को बनाये रखता है।

6. विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान को नये ज्ञान से सम्बन्ध - विद्यार्थियों के एकाग्रता को केन्द्रित करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक पाठ्यांश के सीखाने की योजना के अन्तर्गत सोखाये जानेवाले शीर्षक से विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करें, सम्बन्धित सवाल पूछें और सम्बन्धित तथ्य की जानकारी वर्ग कक्ष में रखें जिससे विद्यार्थियों को एकाग्रता बनी रहती है।

7. सहायक सामग्री का प्रयोग — शिक्षण अधिगम सामग्री बालकों के एकाग्रता बनाये रखने में काफी मददगार सिद्ध होती है। अः शिक्षकों को चाहिए कि अपने वर्ग कक्ष के संचालन में आवश्यक शिक्षण सामग्री का प्रयोग करें।

8. शिक्षण की विभिन्न विधियों का प्रयोग-विद्यार्थियों को खेल, एकल कार्य, सामूहिक कार्य प्रयोग, निरीक्षण में विशेष आनन्द आता है, प्रभावशाली अधिगम, सुनिश्चित होता है जिससे विद्यार्थियों में एकाग्रता का सृजन करने एवं उस संवर्द्धन में विशेष मदद मिलता है। अतः वर्गकक्ष थे सामूहिक कार्य, करके सीखने की योजना, क्रिया विधि, प्रयोगात्मक विधि, खेल विधि, निरीक्षण विधि का यथासंभव प्रयोग किया जाना चाहिए।

9. विद्यार्थियों के रुचियों के प्रति ध्यान—जो अध्यापक शिक्षण के समय बालकों की कक्षियों का ध्यान रखता है, वह उनके ध्यान को केन्द्रित रखने में भी सफल होता है। पाठ की शुरूआत विद्यार्थियों के स्वाभाविक रुचियों से किया जाना चाहिए। फिर, धीरे-धीरे अन्य गतिविधियों में उनकी रुचि उत्पन्न किया जाना चाहिए ।

10. विद्यार्थियों के प्रति उचित व्यवहार-यदि विद्यार्थियों के प्रति शिक्षक का व्यवहार कठोर एवं सख्त होता है तथा वे विद्यार्थियों को छोटी-छोटी बातों पर डाँटता है तो वह उनके ध्यान को आकर्षित नहीं कर पाता है। अतः उसे बालकों के प्रति प्रेम, शिष्टता और सहानुभूति का परस्पर व्यवहार रखना चाहिए।


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