सृजनात्मकता का अर्थ
सृजनात्मकता का अर्थ और परिभाषा,Meaning and definition of creativity in hindi
सृजनात्मकता शब्द अंग्रेजी के क्रिएटिविटी शब्द का हिंदी रूपांतरण है।इस शब्द के समानांतर विधायकता तथा उत्पादन रचनात्मकता ,डिस्कवरी आदि का प्रयोग किया जाता है।सृजन वह अवधारणा है जिसमें उपलब्ध साधनों से नवीन या अनजाने वस्तु विचार या धारणा को जन्म दिया जाता है। सृजनत्मकता से अभिप्राय रचना संबंधी योग्यता नवीन उत्पाद की रचना से है।
सृजनात्मकता की परिभाषाएं (Definition of creativity)
सृजनत्मकता की निम्नलिखित परिभाषाएं हैं।
रूश के अनुसार
“सृजनात्मकता मौलिकता है।जो वास्तव में किसी भी प्रकार की क्रिया में घटित होती है।”
रॉबर्ट फ्रास्ट के अनुसार
“मौलिकता क्या है ? यह मुक्त साहचर्य है जब कविता की पंक्तियां या उसके विचार आपको उद्वेलित करते हैं साधारणीकरण के लिए बाध्य करते हैं।या दो वस्तुओ का संबंध होता हैं, परंतु साहचर्य को देखने की कामना आप नहीं करते हैं आप तो उसका आनंद उठाते हैं"।
क्रो एंड क्रो के अनुसार
“सृजनत्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया है।”
सी वी गुड़ के अनुसार
“सृजनत्मकता एक विचार है।जो किसी समूह में विस्तृत सातत्य का निर्माण करता है। सृजनात्मकता के कारक हैं। साहचर्य आदर्शत्मक, मौलिकता अनुकूलता सातत्य लोच तथा तार्किक विकास की योग्यता।”
बिने के अनुसार, “एक व्यक्ति लकड़ी से मनचाही कलात्मक वस्तु बना सकता है। चित्रकार मनचाहे रंगों से चित्र की सजीवता प्रकट कर सकता है। इसी मूर्तिकार एवं वास्तुविद् भी अपनी कलाओं की छाप छोड़ते हैं। यही तो सृजनात्मकता है।'
सृजनात्मकता का अर्थ
सृजनात्मकता का अर्थ है-"सृजनात्मकता” अंग्रेजी भाषा शब्द "Creativity" “क्रिएटिविटी" का हिन्दी अनुवाद है। भार्गव इलस्ट्रेटेड डिक्शनरी के अनुसार “Creativity" शब्द का अर्थ है By way of Creation जिसका हिन्दी शब्दानुसार होता है-"उत्पादन से"। इस तरह क्रिएटिविर्टी शब्द का हिन्दी पर्याय हुआ “उत्पादन से संबंधित”। इसके समानार्थी अन्य शब्द भी हैं जैसे-विधायका। भारत सरकार के तकनीकी शब्द कोष में क्रियेटिविटी का हिन्दी अनुवाद सृजनशीलता अंकित किया हुआ है। प्रायः मनोविज्ञान की पुस्तकों और प्रयोग में सृजनशीलता के स्थान पर सृजनात्मकता शब्द का ही प्रयोग किया जाता है। अत: यहाँ पर भी सृजनात्मकता का ही प्रयोग किया है।
सृजनात्मकता की परिभाषायें :
2. स्टेन के अनुसार, “जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो जो किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी मान्य हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है।"
3. जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “अनिवार्य रूप से किसी नयी वस्तु का सृजन करना है। रचना, विस्तृत अर्थ में जहाँ पर नये विचारों का संग्रह हो वहाँ पर प्रतिभा का सृजन (वह अनुकृत न होकर स्वयं प्रेरित हो) जहाँ पर मानसिक सृजन का आह्वान न हो।"
सृजनात्मकता तथा बुद्धि-अक्सर देखा गया है कि कुछ व्यक्तियों में उच्च सृजनात्मकता होती है लेकिन उनका बौद्धिक स्तर निम्न होता है। इसी तरह से यह भी जरूरी नहीं है कि जिनका बौद्धिक स्तर उच्च हो, उनमें सृजनात्मकता भी उच्च स्तर की हो। उच्च बौद्धिक स्तर 'तथा उच्च सृजनात्मकता का साथ-साथ चलना बाह्य कारकों पर निर्भर करता है। बैरोन ने अपने अध्ययनों के आधार पर सिद्ध किया कि बुद्धि एवं सृजनात्मकता में घटनात्मक सहसंबंध है लेकिन यह सहसंबंध निम्न स्तर का होता है। सृजनात्मकता के लिए बुद्धि के अलावा अन्य तत्वों की भी आवश्यकता होती है । बहुधा लेखकों, गणितज्ञों, इंजीनियरों आदि में सृजनात्मकता अधिक मात्रा में होती है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि इनमें सृजनात्मकता अधिक मात्रा में हो ही। सृजनात्मकता शून्य में क्रियाशील नहीं हो सकती है। इसमें पूर्व अर्जित ज्ञान का उपयोग होता हैं, यह ज्ञान का उपयोग होता है, यह ज्ञान का उपयोग बौद्धिक क्षमताओं से संबंधित है अतः सृजनात्मकता तथा बुद्धि का समन्वय स्वाभाविक है।
सृजनात्मकता के सिद्धांत :
मनोविश्लेषणवाद, साहचर्यवाद, व्यवहारवाद एवं मनोविज्ञान के अन्य संप्रदायों ने सृजनात्मकता के बारे में अपने-अपने सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं जिनकी व्याख्या निम्न तरह की गयी है-
1. मनोविश्लेषण :- इस सिद्धांत के मुख्य प्रवर्तक फ्राइड ने यह कहा है कि हर प्राणी में कुछ मूल प्रवृत्ति जन्म व्यवहारों में समानता होती है। परंतु इन मूल प्रवृत्तिजन्य कार्यों से हटकर अगर मनुष्य चेतन रहते हुए कोई कार्य करता है तो उसे सृजनात्मकता कहेंगे।
2. साहचर्यवाद :- साहचर्यवाद के अंतर्गत हम परस्पर तत्वों में संबंध स्थापित करते हैं। यह संबंध पदार्थों में साहचर्य द्वारा प्राप्त होते हैं, जिनमें कि संयोग एवं प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है। इन संयोगों तथा प्रणालियों का पुनर्गठन करना ही सृजनात्मक है । इसके द्वारा नवीनता अथवा मौलिकता पैदा करके सृजनात्मक का गुण विकसित किया जा सकता है।
3. समग्रवाद :- समग्रवाद या व्यवहारवाद के अनुसार समस्त समस्या प्रधान कार्यों का हल अंतर्दृष्टि अथवा सूझ का प्रतिफल होता है । इन विचारकों ने सृजनात्मक का आधार अंतर्दृष्टि बताया है। अंतर्दृष्टि द्वारा अगर मस्तिष्क में कोई नई बात आ जाती है जिसके कारण मौलिक कार्य हो जाता है तो उसे सृजनात्मक कहा जायेगा।
शिक्षा में सृजनात्मकता का विकास :
1950 के लगभग औद्योगिक विकास के साथ तकनीकी विकास के समन्वय के लिए अधिक उच्चस्तरीय बौद्धिक योग्यता की आवश्यकता अनुभव की गयी। अतः सांस्कृतिक प्रगति के साथ शिक्षालयों में पढ़ने वाले छात्रों के मनोविकास की समस्या पर केन्द्रीय ध्यान दिया गया । सृजनात्मकता के विकास के लिए यह केन्द्रीयकरण मूल आधार था।
तत्कालीन शिक्षालयों से संबद्ध व्यक्तियों ने सृजनात्मकता शिक्षण के संदर्भ में दो मूल त्रुटियाँ की। छात्र जनसंख्या का वर्ग जिसमें सृजनात्मकता की क्षमता है एवं जिन क्षेत्रों में सृजनात्मकता का विकास किया जा सकता था, दोनों का अक्सीमन किया गया। वास्तव में आविष्कार पाठ्यक्रम के कुछ पक्षों तक सीमित नहीं है बल्कि यही सभी क्षेत्रों में संभव है।
इसके अतिरिक्त शोध-कार्यों से अन्य विचार को बल मिला कि सृजनात्मकता कुछ-न-कुछ टोरेन्श के अनुसार अधिगम कठिनाइयों को अनुभव करने की प्रक्रिया के मध्य विकसित होता है। पर आमतौर से शिक्षा सत्ता के माध्यम से ग्रहण की जाती है । इसलिए सत्ता के द्वारा जो सत्य बताया जाता है शिक्षार्थी स्कूली वातावरण में उसे ही सत्य स्वीकार करना सीखता है । यह अनुकूल नहीं है । अतः शिक्षालयों की शिक्षा के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।
(i) शिक्षालय का वातावरण
(ii) शिक्षक की भूमिका
(iii) कक्षा का वातावरण तथा
(iv) पाठ्यक्रम की व्यवस्था
शिक्षा में सृजनात्मकता के लिए गोर्डन एवं ओसबर्न का मत है कि आधारभूत सुधार अथवा नवीन मौलिक विचारों की उत्पत्ति हेतु इन प्रयासों के मध्य शैक्षिक मूल्यांकन संबंधी कार्य स्थगित कर दिये जाने चाहिए अर्थात् यदि हमें सृजनात्मकता का विकास करना है तो शैक्षिक प्रक्रिया का सीधा संबंध, मूल्यांकन से नहीं होना चाहिए, अन्यथा छात्र मूल्यांकन में उच्च श्रेणी में के लिए, सृजनात्मकता के संबंध पक्ष का महत्व नहीं रहेगा।
टोरेन्श ने लिखा है कि, “सृजनात्मक फीडबैक मूल्यांकनात्मक रिपोर्टों से अधिक उत्तम है, क्योंकि वह शिक्षा का मूल उद्देश्य, व्यक्ति हेतु एक अच्छे भविष्य का निर्माण स्वीकार करता है।
सृजनात्मकता का विकास मनोविज्ञान से जुड़ा है। चूँकि इसका उपयोग अनेक परिस्थितियों में किया जाता है, अत: माता-पिता का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इन पदों का अनुकरण सृजनात्मक चिंतन हेतु किया जा सकता है ।
1. जो भी कुछ बतलाया जाए उसमें समस्या के स्तरों को पहचानने का शिक्षण अवश्य हो । बालक यह अवश्य जान लें कि समस्या किस स्तर की है?
जे. स्टेनली ग्रे ने इस संबंध में कहा है, "समस्या समाधान की योग्यता दो पदों पर निर्भर है-एक व्यक्ति की सीखने की या अधिगम करने की बुद्धिवादी क्षमता या बुद्धि तथा दूसरा यह कि क्या उक्त व्यक्ति ने क्षमता के भीतर अधिगम कर लिया है।"
2. सृजनात्मक शिक्षण हेतु समस्या समाधान के संदर्भ में तथ्यों का अधिगम कराया जाए। इनमें क्या किया, क्या न किया जाना चाहिए आदि प्रश्नों के माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है ।
3. सृजनात्मकता के शिक्षण के लिए मौलिकता की उद्भावना विकसित करने हेतु शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। सृजन तथा मौलिकता से अभिप्राय ज्ञान के तथ्यों को नवीन रूप में ढालना है।
4. बालकों में सही मूल्यांकन करने की प्रवृत्ति विकसित होनी चाहिए। यह सृजनशक्ति को अधिक विकसित करती है।
सृजनात्मकता का महत्व
srijnatmakta ka mahatva;सृजनात्मकता एक ऐसा विचार है कि जिसके माध्यम से बालक-बालिकाओं में निहित मौलिक सम्भावनाओं को विकसित किया जाता है। बालकों में चिन्तन एवं मौलिक अभिव्यक्ति की दृष्टि से सृजनात्मकता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। सृजनात्मकता का शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं अपितु सर्वत्र महत्व है। शैक्षिक कार्यक्रम को उपयोगी बनाने तथा लक्ष्यपूर्ति की दृष्टि से सृजनात्मकता का विशेष महत्व है । सृजनात्मकता का महत्व निम्नलिखित बातों से स्पष्ट होता है--
1. सृजनात्मकता मौलिकता तथा नवीनता के अद्भुत गुणों के विकास के लिये महत्वपूर्ण हैं।
2. इससे चिंतन की प्रबल इच्छा प्रखर एवं विकसित होती है। फलतः जटिल से जटिल समस्या का हल सम्भव हो पाता है।
3. सृजनात्मकता में संवेदनशीलता और गम्भीरता के लक्षण विद्यमान रहते हैं इसलिये यह उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य करने की क्षमता के विकास में सहायक होती है।
4. सृजनात्मकता परम्परागत धारणा को नये सिरे से लेकर आगे खोज की प्रवृत्ति की ओर उन्मुख करती है।
5. सृजनात्मकता ऐसे विचारों को विकसित कर स्थापित करती है जिसमें वास्तविकता और व्यावहारिकता की पर्याप्त मात्रा रहती है।
6. सृजनात्मकता उत्तरदायित्व के साथ कार्य के प्रति निष्ठा, लगन, परिश्रम तथा कार्य पूर्णता में दृढ़ आस्था के प्रति सजग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। 7. सृजनात्मकता तर्क, कल्पना, विचार-शक्ति एवं संगठन करने की शक्ति के विकास में सहायक है।
8. सृजनात्मकता, दूरदर्शिता और बुद्धिमता को प्रखर करती है।
9. इससे भविष्य की सोचने, वर्तमान का भविष्य से सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता प्राप्त होती है।
10. सृजनात्मकता एकाग्रचित्त होकर अत्यन्त शान्त एवं धैर्यपूर्ण भाव से कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती है। 11. यह स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का विकासित करती है।
12. सृजनात्मकता के फलस्वरूप आत्मविश्वास की भावना प्रबल एवं सुदृढ़ होती है।
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